Monday, September 14, 2009

चंदा मामा


चंदा मामा क्यों बैठे हो


बादल के पीछे आंखे मीचे


तारों से तुमने कर ली क्या कटटी


दूर खडे़ हो गुमसुम अकेले


आंखे बंदकर दस तक गिनूंगा


आ जाना तुम छत पर मेरे


पापा से कहकर दिलवा दूंगा


ढेर सारे तुमको खिलौने


मम्मी बना देगी हलवा पूड़ी


खा लेंगे हम थोड़ी थोड़ी


नींद लगेगी तो सो जाना


मीठे सपनों में खो जाना

4 comments:

Anonymous said...

वाह !! हर बच्चे का चंदा मामा से जुडाव कुछ ऐसा ही होता है..

Udan Tashtari said...

वाह बबलू वाह!

संजय तिवारी ’संजू’ said...

आपका हिन्दी में लिखने का प्रयास आने वाली पीढ़ी के लिए अनुकरणीय उदाहरण है. आपके इस प्रयास के लिए आप साधुवाद के हकदार हैं.

आपको हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनायें.

विजय कुमार झा said...

बहुत खूब भाई। मन को छू गया। काश मैं भी बच्‍चा होता और आप इस तरह की कविता सुनाते। यह सोचकर मन रोमांचित हो उठता है।