Sunday, August 23, 2009

होरिल के लिए लोरी




पलकों की सांकल
खटका रही है
निंदिया रानी आ रही है

निंदिया के रथ में
चंदा का घोड़ा
पूरब से निकला
पशिचम को दौड़ा
तारों की चुनरी
लहरा रही है
निंदिया रानी आ रही है

निंदिया ने खोली
सपनों की झोली
कितने खिलौने
कितनी ठिठोली
सपनों में परियां
मुसका रही हैं
निंदिया रानी आ रही है

शोर निकल जा
दरवाजे से
थोड़ा ठहर तो
रात निगोड़ी
होरिल को
निंदिया आ रही है
मममी लोरी सुना रही है


पलकों की सांकल
खटका रही है
निंदिया रानी आ रही है

3 comments:

Mithilesh dubey said...

उम्दा व लाजवाब रचना।

महेन्द्र मिश्र समयचक्र said...

लोरी ख़ूबसूरत लगी . बहुत उम्दा
गणेश उत्सव पर्व की शुभकामनाये

sumita said...

bachapan ke din bachchon ke saath phir lautate hain....vaise lagata nahin hai yeh tumhari lori se so jata hoga...